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Dil ki Aawaz

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ख़ुद से हार कर,

दुनिया जीतने चले थे,

झुलसा कर ख़ुद को,

सब को रौशन करने चले थे,

ख़ुद को क़ज़ा सी सज़ा देना,

कबसे इनायत-ए-ज़रिया ज़रूरी हुआ,

ये समझ आया होता,

तो ख़ुद को पहले आबाद किया होता,

आख़िर ख़ुद से नाराज़गी ही

ख़ुद की क़ज़ा हो गई।

ख़ुद से हार कर,

दुनिया जीतने चले थे...


जीतना ख़ुद को था,

लड़ाई भी ख़ुद ही से थी,

समझना भेद जीने और होने का,

दुनिया ख़ुद की फ़तह करनी थी।

जो थम गए एक पल,

धड़कन ने आवाज़ दी,

चले आओ वापस,

बात अब शुरू होगी,

सुन लो मुझे तुम,

मुस्कान ना थमेगी,

दुनिया तुमसे पूछेगी,

तुम्हारे पास क्या

है कोई जादू की छड़ी?

ख़ुद से ना हारो,

अपने दिल को जीतो,

तुम्हारे होने से,

रौशन ख़ुद-ब-ख़ुद दुनिया होगी।

ख़ुद से हार कर,

दुनिया जीतने की,

कोई भी ज़रूरत नहीं,

ख़ुद के संग चलना

ज़्यादा है ज़रूरी।

©Seema Chawdhary🦋

19 January 2026

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